राष्ट्रकूट जैन साम्राज्य
# राष्ट्रकूट जैन साम्राज्य , जैन आचार्य ओर... - Ancient Jain Kings of South India
# राष्ट्रकूट जैन साम्राज्य , जैन आचार्य ओर जिनागम - भाग १ #
# राष्ट्रकूट साम्राज्य कालावधि इ. ७५३ से इ.९८२
# राष्ट्रकूट साम्राज्य में बहुतांश सम्राट और उनके सामंत जैन थे .
इस साम्राज्य का विस्तार मध्य भारत से दक्षिण भारत तक हुआ . इनकी राजधानी मालखेड अभी का जिला गुलबर्गा हुआ करती थी.
जैन राजओंके कारण इस साम्राज्य में जैन आचार्य एवं मुनि , जैन कवी , जैन साहित्य इनको राजाश्रय था.
इसलिए इनके कालखंड में कन्नड़ और संस्कृत में विपुल आगम ग्रन्थोंका का निर्माण हुआ.
अनेक जिनमन्दिर ( पट्टडकल जिनमन्दिर , मालखेड - नेमिनाथ मंदिर आदि) ओर गुफाओंका ( एलोरा - आदि ) निर्माण हुआ.
अनेक राजाओंके गुरु महानतम जैन आचार्य थे.
इस काल मे जैनियोंकी संख्या १/३ थी.
इस लिए राष्ट्रकूट साम्राज्य का २५० वर्षोंका कालखंड दक्षिण जैनोंका सबसे सफल और यशस्वी कालखंड कहा जाता था.
# राष्ट्रकूट साम्राज्य और आचार्य जिनसेन आदि अनेक महान जैन आचार्य
इस साम्राज्य में प्रमुखता से अमोघवर्ष १ का नाम आता है. इनका कालावधि इ.८१४ से इ.८७८ तक ६४ वर्षों तक रहा.
राष्ट्रकूट साम्राज्य केअमोघवर्ष १ के काल में यह साम्राज्य दुनिया ४ सबसे शक्तिशाली साम्रज्य कहा जाता था.
इनके कालमें जैन कन्नड़ और संस्कृत साहित्य का सुवर्ण काल कहा जाता था. इसी काल में जैन धर्म का प्रचार और प्रसार सर्वाधिक हुआ.
# आचार्य श्री जिनसेन अमोघवर्ष १ के गुरु थे. जिनकी महान ग्रन्थ रचना आदिपुराण का जैन आगम में अद्वितीय स्थान है.
# आचार्य श्री गुणभद्र - अमोघवर्ष १ के पुत्र कृष्णा २ के गुरु थे .
इनके महानआगम ग्रन्थ उत्तरपुराण , आत्मानुशासन , हरिवंशपुराण , पार्श्वाभुदय की रचना इसी काल खंड में हुई.
# आचार्य महावीर - ये गणित शास्त्र में विद्वान थे इन्होने गणितसार संग्रह नाम काम ग्रन्थ की रचना कियी.
# आचार्य श्री वीरसेन - जैन आगम के प्रमुख ग्रन्थ षटखंङागम की टिका धवला , जयधवला की रचना कियी.
#आचार्य श्री शाकटायान - इनकी ग्रन्थ रचना शब्दानुशासन , अमोघवृत्ति
कवी श्री चामुंङराय - चरित्रसार , चामुंडराय पुराण
# मुनि श्री अमोघवर्ष १ - सम्राट अमोघवर्ष १ ने अंत में दिक्षा लियी और प्रश्नोत्तर रत्नमाला ग्रन्थ की रचना कियी.
# आचार्य श्री अकलंकदेव - इन महान आचार्य श्री ने अनेक आगम ग्रंथोंकी रचना कियी . जैसे राजवर्तिका , न्यायविनिश्चय , अष्टाशती , सिद्धिविनिश्चय, स्वरुपसंबोधन - पंचविन्शती. यह वाद-विवाद में निपुण थे ओंर अनेक अन्य मतीयों पर उन्होंने विजय प्राप्त किया.
क्रमशः
# Arhaddas Jain #
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