जैन धर्म और बौद्ध धर्म के बीच क्या अंतर है?
जैन धर्म और बौद्ध धर्म मे अंतर :-
1.जैन धर्म के ग्रन्थ प्राकृत में है जबकि बौद्ध धर्म के पाली में.
2.जैन धर्म की दो संगति हुई पहली पाटलीपुत्र में(300 ई. पू.) वे दूसरी वल्लभी (513ई.)में। जबकि बौद्ध धर्म की चार संगति हुई
1.राजग्रह 483 ई. पू.
2.वैशाली 383ई.पू.
3.पाटलीपुत्र 251 ई. पू.
4..कश्मीर 1 शताब्दी
3.जैन धर्म के त्रीरत्न सम्यकश्रद्धा, सम्यकज्ञान, सम्यकआचरणहै। जबकि बौद्ध धर्म के त्रीरत्न बुद्ध, धर्म और संघ है।
4.जैन धर्म में जाति प्रथा का विरोध किया है पर वर्ण व्यवस्था का नहीं, जबकि
बौद्ध धर्म में जाति प्रथा व वर्ण व्यवस्था दोनो का विरोध किया है।
5.जैन धर्म में देवताओं को जिन के नीचे रखा है तथा पुनर्जन्म मे विश्वास, जबकि बौद्ध धर्म अनिश्वरवादी, अनात्मवादी, तथा पुनर्जन्म में विश्वास।
6. जैन धर्म अनन्त चतुष्टय, स्यादवाद को मानताहै जबकि बौद्ध धर्म आष्टागिंक मार्ग, क्षण भंगवाद, नैरात्मवाद, प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धांत को मानता है।
जैन धर्म आत्मा को समझाने के लिये दो हिस्से मानता है ।
प्रथम द्रव्य और दूसरा पर्याय।
द्रव्य वाला हिस्सा सदैव शुद्ध रहता है परन्तु पर्याय वाला हिस्सा प्रत्येक क्षण परिवर्तन होता रहता है और कर्मो के पुद्-गल आत्मा के इसी भाग पर रहते है।
अच्छे कर्म करे तो अच्छे फल और बुरे कर्म करे तो बुरे फल मिलते है।
कुछ कर्मो का फल इसी भव में मिल सकता है शेष का फल आगे के भवो में मिलता है।साधना करके यदि हम सभी कर्मौ का क्षय कर देते तो मोक्ष हो जाता है और जन्म मरण से छुटकारा प्राप्त कर सकते है।
बौद्ध धर्म के अनुसार पर्याय प्रति क्षण बदलने के साथ उनके किये गये कर्मो का फल भविष्य में नहीं मिलता है।
संसार के दुखों में से निकल कर मोक्ष पाने जैन दर्शन में चौदह गुणस्थान, संवर और निर्जरा की विधि बताई है| ये पूरी बात कैसे वेदों के सात चक्रों और सात शरीर, महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग और भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग के साथ समानता में है?
जैन दर्शन में चौदह गुणस्थान, संवर और निर्जरा की आसान शब्दों में समझ
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